निशंक काव्य


एक 
श्रम में शक्ति सृजन की होती,श्रम की बूँदें बनती मोती,
श्रम के रस की पावन धारा, सारा कलुष अपावन धोती।
श्रम के गीत जागते युग को, श्रम का होता अभिनन्दन है।।

श्रम जीवन का रंग महल है, श्रम ही जाग्रति की हलचल है
श्रम जग में परिवर्तन लाता, श्रम संस्कृति का गंगाजल है।
श्रम में श्री के साथ हृदय में, ममता का होता स्पन्दन है।।

श्रम ही पूँजी का सहचर है, श्रम की वाणी बड़ी मुखर है
श्रम की सीढ़ी पर चढ़कर ही, मिला प्रगति का उच्च शिखर है।
विद्युत निज प्रकाश बिखराकर, करती निज श्रम का वन्दन है।।
दो 
मैंने एक किरन माँगी थी तुमने नीलगगन दे डाला 
मैंने दो मधु-कण माँगे थे तुमने सावन घन दे डाला।

स्वप्न सजा भींगी पलकों पर, मन में क्वांरी पीर बसाकर,
साधों के मन्दिर में बैठा, आशा का लघु दीप जलाकर,
एकाकीपन खले न मन को रूप तुम्हारा छले न मन को,
मैंने मधुर मिलन माँगा था ,तुमने यह बंधन दे डाला।

विस्मृति की मधुमय घड़ियों में मादक सपने लगे सुहाने,
पुलक उठी मन की आशाएँ स्वप्न लगे श्रृंगार सजाने,
गीतों के वंशी के स्वर में  पीर न अंतर की सो जाये,
मैंने अपनापन माँगा था, तुमने पागलपन दे डाला।

तुमको पाकर लगा कि मेरा माधव ही मुझमें मुसकाया,
तुम रूठे तो लगा कि मेरा पीड़ा से अंतर भर आया,
फैले सुख की मधुर चाँदनी मिलन यामिनी युग बन जाये,
मैंने तो यौवन माँगा था, तुमने यह दर्शन दे डाला।
तीन 
 दर्पण चकनाचूर हो गया।
मन में तुम्हें बसाकर भी मैं तुमसे इतना दूर हो गया।

बिखर गये प्रतिबिम्ब तुम्हारे, एक रूप-शशि अगणित तारे।
मिलन-साँझ का क्षितिज सुनहरा, ऊषा का सिन्दूर हो गया।
मन में तुम्हें बसाकर भी मैं तुमसे इतना दूर हो गया।।

प्यार बरसता सावन-घन बन, रूप-सुधा में है पागलपन।
खोकर पाना, पाकर खोना, दुनिया का दस्तूर हो गया।
मन में तुम्हें बसाकर भी मैं तुमसे इतना दूर हो गया।।

दृग मृग से ये भोले-भाले, लगे पंचशर की द्युति वाले।
ऐसे गड़े कि घायल मन भी, मधु-रस से भरपूर हो गया।
मन में तुम्हें बसाकर भी मैं तुमसे इतना दूर हो गया।।
चार
जब से तुमने दिशा मोड़ दी राह बहुत आसान हो गयी।
जुही फूल सा प्यार तुम्हारा, मन्द -मन्द महका जीवन में।
उषा सदृश तुम्हारी चितवन, जगा गयी नव ज्योति नयन में।
जब से तुम प्राणों में पुलके, पीड़ा से पहचान हो गई।

विहँस उठे रजनीगन्धा ज्यों, अपने बासन्ती यौवन में,
जैसे प्रातः किरण जगाये, सोया प्यार मधुप के मन में।
वैसे तुम गीतों में विलसे, मेरी प्रीति जवान हो गई।

शीश महल सा जग लगता है, हर दर्पण में रूप तुम्हारा।
जेठ दुपहरी में छाया सा, प्यार बन गया एक सहारा।
जब से तुम कण-कण में बिखरे, मेरी दृष्टि महान हो गई।
पांच
माँ, मुझको भी अपना वर दो।
मेरी इस कंचन-काया को, रूप और रस-गन्ध अमर दो |

भावुकता से विह्वल मन में,मेरे मुकुलित काव्य सुमन में 
भावों के मादक मधुवन में, विश्वासों के मलय पवन में 
प्राणों के पुलकित अर्पण में, चरण-कमल-केसर-रज भर दो।

उतर धरा पर आये अम्बर, इन्द्रधनुष लहरें लहरों पर 
धन की करुणा बरसे झर-झर, गूंज उठे समता का मृदु स्वर 
जितनी तृषा भरी नयनों में, उतने सरस अधर तुम कर दो।

छन्द-विहग को अविरल गति दो, शब्दों को लय की परिणति दो 
पीड़ा दो पर पावन रति दो, प्रणयी मन को सहज प्रणति दो 
मृगजल छल न सके जीवन को, कविता को निज छवि-अक्षर दो।


छ: (दोहे)
नदिया कहती जा रही दिया न जी भर प्यार

मैं आगे बढ़ती रही गिरते रहे कगार।।

चेहरे से लगते भले, चलते गहरी चाल
वाणी सरस रसाल है, चितवन है मधुबाल।।

स्वामी जी अपना रहे भौतिकवादी ढंग
वसन जोगिया पर चढ़ा राजनीति का रंग।।

बिरहा निर्गुण की जगह अपने-अपने राग
दुर्लभ होते जा रहे आल्हा-चैती-फाग।।

यांत्रिकता ने प्रकृति को कर डाला विद्रूप
नदियों में विष बह रहा सुख गए हैं कूप।।

वायु-अन्न-फल-नीर में गया प्रदूषण व्याप
सड़कों पर उड़ता धुवाँ कल-युग का अभिशाप।।

कनक -प्रभा किंजल्क की मधु-मकरन्द सुवास
फिर भी चम्पा-पुष्प के भ्रमर न जाता पास।।

सावन जूही-चाँदनी भादों हर-सिंगार
गेंदा फूले माघ में फागुन में कचनार।।

बाग और वन कट गये सभी हो गये खेत
रूठे बादल उड़ गये धरती होगी रेत।।

अंधकार-उर चीर कर उगता है आदित्य
आशा-ज्योति विखेरता सत्कवि का साहित्य।।

पश्चिम के रंग में रँगे नहीं पूर्व का ज्ञान
स्वयं भूलते जा रहे हम अपनी पहचान।।

भौतिकता की होड़ में सदाचार बेकार
जलकुम्भी सा जम गया जग में भ्रष्टाचार।।

पीड़ा का अनुभव नहीं मन सुख से भरपूर
बातें करें गरीब की रहकर उनसे दूर।।
व्याकुल अब न शकुन्तला पल-पल मिलन-वसन्त
कली-कली रस में ढली गली-गली दुष्यन्त।।



भारत की माटी

सिन्धुजा के पति जाके उर में निवास करैंs]

सिन्धु जाके चरन पखारि उमहति है।

सैलजा के नाथ जाके माथ पै धरे हैं हाथ]

सैल जाके सीस चढ़ि गौरव लहति है।

संगम की बानि जाके उर जड़&जंगम की]

प्रेम की पुनीत रसधार सी बहति है।

छन्दन सों बन्दन कै ऐसे दिव्य भारत की]

भारती हू आरती उतारति रहति है।
अजहूँ स्वदेस&प्रेम&भाव उमह्यो सो परै]
राना बेनीमाधव की अकह कहानी में।
अजहूँ भगतसिंह जैसो है उछाह भर्यो]
सूली को पटल चूमिबे की अगवानी मैं।
जौहर की ज्वाल जगै अजौं बीर नारिन मैं]
गूँजै ललकार अजौं कबिन की बानी मैं।
माटी को सिंगार अजौं सीस दै करत बीर]
बूड़त बिपच्छी अजौं भारत के पानी मैं।

लाजपत&गोखले औ तिलक के तप-त्याग-
साधना सों यामैं सुघराई कछु आई है।
जुगन ते सोय कै गँवाई जो कमाई] तामें
गाँधी&ज्ञान लहि गरुआई कछु आई है।
पोंछि&पोंछि माँगको सिंदूर चढ़्यो चावन सों]
तब दुति पाइ अरुनाई कछु आई है।
सींची गई धरती सहीदन के स्रोनित सौं
माटी माँहि तब तरुनाई कछु आई है।

बिटिया कै पाती
हियाँ सबु लागति नवा&नवा।

सुर्ज उये मुँह ढकि कै सोवैं] चाय पियैं पलका पर]
माँजैं दाँत सबै कूँचिन ते] भीड़ लगै बम्बा तर]
टोंटी पानी] औ बिजुली का पंखा देय हवा।।

हियाँ न नीम] न गूलर&पाकर] ना बरगद कै छाँहीं
सड़कन पर उड़ि रहा धुवाँ है] स्वच्छ वायु कहुँ नांहीं।
दम घुटि रहा सहर मां रहि कै] यहि कै कौन दवा\

राह चलति पर ठोकर मारैं] मोटर औ इसकूटर]
जो कौनौ चोटियाय जाय तौ] भागैं दै कै टक्कर]
तीर न आवैं] टुकुर-टुकुर सब देखैं] होयँ हवा।।

इसकूलन मां रोजु&रोजु] हड़तालन का है फैसन
कबहूं लरिका] कबहूं टीचर] नाचैं करैं प्रदरसन।
दैया] पढ़े लिखे लोगन का जानै का होइ गवा\

हियाँ सलीमा ज्ञानु पढ़ावै] टी-बी- ध्यानु सिखावै]
ननदी दोस्तन के सँग घूमै] देर राति घर आवै]
हमका सबै कहैं देहातिनि] हियाँ केरि मरदवा।।
हियाँ चलति उपरा&चुपरी है] वैभव अपन देखावैं]
ऐसन धाधि^ बढ़ी पैसन कै] देउतन का भरमावैं]
पढ़ब छाँड़ि नेतन के पाछे घूमति हैं लरिकवा।।

तुलसी पूजा] देबी दरसन औ बाँचब रामायन
कही न कछु मारे संकोचन] दाबि रही आपन मन]
थोरा लिखा] समुझिहौ ज्यादा] काटिति आपन बवा।।